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ईरान तनाव के बीच अमेरिकी शेयर बाजार रिकॉर्ड पर, तेल 100 डॉलर पार

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ईरान के साथ तनाव के बीच अमेरिकी शेयर बाजार ने रिकॉर्ड ऊंचाई छुई, S&P 500, Nasdaq में तेजी जबकि तेल 100 डॉलर पार। वैश्विक बाजारों में मिला-जुला रुख।

मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान से जुड़े हालात के बीच जहां दुनिया भर के बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है, वहीं अमेरिका का शेयर बाजार इस दबाव को दरकिनार करते हुए नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया। बुधवार को वॉल स्ट्रीट में जबरदस्त तेजी देखने को मिली, जिसने निवेशकों को चौंका दिया। प्रमुख इंडेक्स रिकॉर्ड स्तर पर बंद हुए और इससे यह संकेत मिला कि मजबूत कॉर्पोरेट नतीजे फिलहाल वैश्विक जोखिमों पर भारी पड़ रहे हैं।

अमेरिकी बाजार में सबसे प्रमुख सूचकांक S&P 500 करीब एक प्रतिशत की बढ़त के साथ अपने पिछले सर्वकालिक उच्च स्तर को पार करने में सफल रहा। इसके साथ ही डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज में भी मजबूती देखने को मिली और यह सैकड़ों अंकों की बढ़त के साथ बंद हुआ। टेक्नोलॉजी शेयरों में आई तेजी के चलते नैस्डैक कंपोजिट ने भी उल्लेखनीय उछाल दर्ज किया और नया रिकॉर्ड बनाया। यह तेजी ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर युद्ध और ऊर्जा संकट की आशंकाएं बनी हुई हैं।

इस उछाल के पीछे सबसे बड़ा कारण बड़ी कंपनियों के मजबूत तिमाही नतीजे रहे। कई दिग्गज कंपनियों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया, जिससे निवेशकों का भरोसा और मजबूत हुआ। खास तौर पर ऊर्जा और टेक्नोलॉजी सेक्टर से जुड़ी कंपनियों ने बाजार को ऊपर ले जाने में अहम भूमिका निभाई। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी मांग में तेजी ने भी निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ाई है, जिसके चलते डेटा सेंटर और तकनीकी सेवाओं से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में उछाल देखा गया।

कुछ कंपनियों के शेयरों में असाधारण तेजी देखने को मिली। ऊर्जा और औद्योगिक क्षेत्र की एक प्रमुख कंपनी ने बेहतर मुनाफे और बड़े ऑर्डर मिलने की वजह से निवेशकों को आकर्षित किया और उसके शेयरों में दो अंकों की तेजी दर्ज की गई। इसके अलावा हेल्थकेयर, एविएशन और उपभोक्ता उत्पाद कंपनियों के शेयरों में भी सकारात्मक रुख बना रहा। इन कंपनियों के मजबूत वित्तीय प्रदर्शन ने बाजार को सहारा दिया।

दिलचस्प बात यह रही कि इस तेजी के बीच कुछ नए सेक्टर भी चर्चा में आए। कैनाबिस इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनियों में भी तेजी देखने को मिली। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी प्रशासन इस सेक्टर को लेकर नियमों में ढील देने की दिशा में विचार कर रहा है, जिससे टैक्स बोझ कम हो सकता है। इस खबर ने निवेशकों को आकर्षित किया और संबंधित कंपनियों के शेयरों में उछाल आया।

हालांकि बाजार में इस उत्साह के बीच एक बड़ी चिंता भी सामने आई और वह है कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर गई, जो पिछले कुछ समय में सबसे बड़ा उछाल माना जा रहा है। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से ईरान से जुड़े तनाव और संभावित सप्लाई बाधाओं के कारण हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

युद्ध से पहले जहां कच्चे तेल की कीमतें लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं, वहीं अब यह 100 डॉलर के ऊपर पहुंच चुकी हैं। यह बदलाव वैश्विक बाजारों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे महंगाई बढ़ सकती है और केंद्रीय बैंकों की नीतियों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि कुछ विश्लेषकों का कहना है कि बाजार अब इन झटकों के प्रति पहले से अधिक तैयार है, इसलिए उतार-चढ़ाव सीमित रह सकता है।

दूसरी ओर, वैश्विक शेयर बाजारों की स्थिति मिली-जुली रही। यूरोप के बाजारों में गिरावट देखने को मिली, जहां निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया। वहीं एशियाई बाजारों में मिश्रित रुझान रहा। जापान का प्रमुख सूचकांक हल्की बढ़त के साथ बंद हुआ, जबकि हांगकांग के बाजार में गिरावट दर्ज की गई। यह संकेत देता है कि वैश्विक निवेशक अभी भी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं।

इस बीच कुछ कंपनियों के शेयरों में गिरावट भी दर्ज की गई। एक प्रमुख रिटेल कंपनी के शेयरों में गिरावट आई, क्योंकि उसके शीर्ष प्रबंधन में बदलाव की घोषणा की गई। निवेशक इस तरह के बदलावों को लेकर अक्सर सतर्क रहते हैं, जिसका असर शेयर की कीमत पर पड़ता है।

भू-राजनीतिक स्तर पर सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी हुई है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है और यहां बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा सप्लाई के लिए खतरा बन सकता है। खबरें हैं कि इस क्षेत्र में कुछ जहाजों को रोका गया और कार्रवाई की गई, जिससे स्थिति और संवेदनशील हो गई है।

अमेरिका की ओर से एक तरफ जहां युद्धविराम को बढ़ाने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी तरफ ईरान के खिलाफ कड़े कदम भी जारी हैं। इस दोहरे रुख ने बाजार में अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर न केवल ऊर्जा बाजार बल्कि वैश्विक व्यापार और निवेश पर भी पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में अमेरिकी शेयर बाजार की मजबूती यह दिखाती है कि निवेशक अभी भी कंपनियों के बुनियादी प्रदर्शन पर भरोसा कर रहे हैं। हालांकि तेल की कीमतों में तेजी और भू-राजनीतिक जोखिम आने वाले समय में बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

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